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September 30, 2026

ज्वालामुखी मंदिर (Jwalamukhi Temple, Kangra, Himachal Pradesh)

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Jwalamukhi Temple Timings: Know the Darshan, Aarti and Pooja Timings

ज्वालामुखी मंदिर भारत के प्रमुख और अत्यंत प्रसिद्ध शक्तिपीठों में से एक है। यह मंदिर शिवालिक पर्वतमाला की पहाड़ियों में स्थित है और अपनी अद्भुत दिव्यता के लिए जाना जाता है।

यह पवित्र स्थान ज्वाला देवी को समर्पित है, जिन्हें प्रकाश और ऊर्जा की देवी माना जाता है। इस मंदिर की सबसे खास बात यह है कि यहां किसी मूर्ति की पूजा नहीं होती, बल्कि धरती से निकलने वाली प्राकृतिक ज्वालाओं (अग्नि) को ही माता का स्वरूप माना जाता है।

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, जब माता सती के शरीर के अंग पृथ्वी पर गिरे थे, तब यहां उनकी जिह्वा (जीभ) गिरी थी। इसी कारण यह स्थान शक्तिपीठ के रूप में पूजनीय है और यहां माता सती ज्वाला देवी के रूप में सदियों से विराजमान मानी जाती हैं।

ज्वालामुखी मंदिर आस्था, चमत्कार और दिव्यता का अद्भुत संगम है, जहां हर साल हजारों श्रद्धालु माता के दर्शन करने आते हैं और उनकी अनंत शक्ति का अनुभव करते हैं।

कहा स्थित है ज्वाला मुखी मंदिर (Jwalamukhi temple location)

ज्वालामुखी मंदिर हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित एक प्रसिद्ध शक्तिपीठ है। यह मंदिर कांगड़ा घाटी से लगभग 35 किलोमीटर दक्षिण दिशा में स्थित है।

पहाड़ियों और प्राकृतिक सुंदरता से घिरे इस पवित्र स्थान तक सड़क मार्ग से आसानी से पहुंचा जा सकता है। ज्वालामुखी मंदिर अपनी दिव्य ज्वालाओं और धार्मिक महत्व के कारण देश–विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।

इस प्रकार, ज्वालामुखी मंदिर हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल के रूप में स्थापित है।

ज्वालामुखी मंदिर का निर्माण किसने करवाया (Who built jwalamukhi temple )

ज्वालामुखी मंदिर का निर्माण किसी एक शासक द्वारा नहीं कराया गया, बल्कि अलग–अलग समय में कई राजाओं ने इसके निर्माण और पुनर्निर्माण में योगदान दिया है।

इतिहास के अनुसार, सबसे पहले राजा भूमिचन्द्र ने शिवालिक पहाड़ियों में ज्वाला देवी के पवित्र स्थान की खोज की और वहां मंदिर का प्रारंभिक निर्माण करवाया।

इसके बाद सिख साम्राज्य के महान शासक महाराजा रणजीत सिंह ने इस मंदिर का भव्य रूप से पुनर्निर्माण और सौंदर्यीकरण करवाया।

फिर वर्ष 1835 में राजा संसारचन्द्र ने भी मंदिर के निर्माण और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इस प्रकार, ज्वालामुखी मंदिर का वर्तमान स्वरूप कई शासकों के योगदान का परिणाम है, जिसने इसे आज एक भव्य और प्रसिद्ध शक्तिपीठ के रूप में स्थापित किया है।

हिमाचल में स्थित ज्वालामुखी मंदिर का इतिहास (History of jwalamukhi temple )

ज्वालामुखी मंदिर का इतिहास अत्यंत प्राचीन और रहस्यमयी माना जाता है, जो पौराणिक कथाओं और आस्था से जुड़ा हुआ है।

पुराणों के अनुसार, यह वही पवित्र स्थान है जहां माता सती की जिह्वा (जीभ) गिरी थी। इसी कारण यहां धरती से निकलने वाली अनंत ज्योतियां (ज्वालाएं) माता के दिव्य स्वरूप के रूप में पूजी जाती हैं।

एक प्रचलित कथा के अनुसार, कई हजार वर्ष पहले एक चरवाहा रोज अपनी गायों को जंगल में चराने ले जाता था। उसने देखा कि उसकी एक गाय रोज शाम को बिना दूध के लौटती है। यह घटना कई दिनों तक होती रही, जिससे वह हैरान हो गया।

एक दिन चरवाहे ने उस गाय का पीछा किया और देखा कि एक छोटी बालिका गाय का दूध पी रही है। उसने यह बात राजा भूमिचन्द्र को बताई।

जब राजा ने अपने सैनिकों से जांच करवाई, तो यह ज्ञात हुआ कि वह बालिका कोई साधारण बच्ची नहीं, बल्कि माता सती का दिव्य रूप थीं। कहा जाता है कि जिस स्थान पर माता की जिह्वा गिरी थी, वहां से निरंतर ज्वाला प्रकट होती रहती है।

इस चमत्कार को देखकर राजा भूमिचन्द्र ने उसी स्थान पर मंदिर का निर्माण करवाया, जो आज ज्वालामुखी मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है।

इस प्रकार, ज्वालामुखी मंदिर का इतिहास आस्था, चमत्कार और देवी शक्ति के अद्भुत संगम को दर्शाता है, जो आज भी श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है।

ज्वाला मुखी मंदिर में प्रज्वलित ज्वाला (Jwala mukhi temple flame )

ज्वालामुखी मंदिर अपनी अद्भुत और चमत्कारी अनंत ज्वालाओं के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है। यहां पर जलने वाली पवित्र ज्वाला बिना किसी ईंधन के सदियों से लगातार प्रज्वलित मानी जाती है, जिसे देवी शक्ति का दिव्य रूप माना जाता है।

भक्तों की मान्यता है कि यही ज्वाला माता सती के ज्वाला देवी स्वरूप का प्रतीक है, और इसी कारण यहां किसी मूर्ति की नहीं, बल्कि ज्वालाओं की पूजा की जाती है।

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, इस मंदिर में प्रज्वलित ज्वालाएं देवी दुर्गा के नौ स्वरूपों का प्रतिनिधित्व करती हैं। ये रूप इस प्रकार माने जाते हैं:

  • महाकाली
  • अन्नपूर्णा
  • चंडी
  • हिंगलाज
  • विंध्यवासिनी
  • महालक्ष्मी
  • सरस्वती
  • अंबिका
  • अंजी देवी

मंदिर में इन पवित्र ज्वालाओं के समक्ष भक्त श्रद्धा से पूजा-अर्चना करते हैं और अपनी मनोकामनाएं व्यक्त करते हैं।

यहां माता ज्वाला देवी को विशेष रूप से रबड़ी का भोग अर्पित किया जाता है, जो इस मंदिर की एक खास परंपरा है।

इस प्रकार, ज्वालामुखी मंदिर की यह दिव्य ज्वाला आस्था, चमत्कार और देवी शक्ति का अद्वितीय प्रतीक है, जो सदियों से श्रद्धालुओं को आकर्षित करती आ रही है।

ज्वालामुखी मंदिर दर्शन समय (Temple darshan timming )

मंगल आरती  – सुबह 5 बजे से सुबह 6  बजे तक

पंजुपचार पूजन – सुबह मंगल आरती के बाद

भोग आरती – दोपहर 11  बजे से 12  बजे तक

संध्या आरती – शाम 7  बजे से 8 बजे तक

श्यन आरती – रात 9  बजे से 10 बजे तक

ज्वालामुखी मंदिर दर्शन समय (Temple darshan timming )

मंगल आरती  – सुबह 5 बजे से सुबह 6  बजे तक

पंजुपचार पूजन – सुबह मंगल आरती के बाद

भोग आरती – दोपहर 11  बजे से 12  बजे तक

संध्या आरती – शाम 7  बजे से 8 बजे तक

श्यन आरती – रात 9  बजे से 10 बजे तक

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