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April 3, 2026

दंतेश्वरी माता का मंदिर- Danteshwari Temple: History, Timings and How to Reach

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दंतेश्वरी माता का मंदिर- Danteshwari Temple: History, Timings and How to Reach

भारत में अनेक देवीदेवताओं की पूजा की जाती है और उनसे जुड़े असंख्य प्राचीन मंदिर आज भी आस्था के केंद्र बने हुए हैं। इन्हीं में से एक प्रसिद्ध शक्ति पीठ है माँ दंतेश्वरी का मंदिर, जो अपनी प्राचीन परंपराओं और लोकमान्यताओं के कारण विशेष महत्व रखता है। श्रद्धालु यहाँ बड़ी संख्या में अपनी मनोकामनाएँ लेकर आते हैं और माता का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

इस ब्लॉग में हम आपको दंतेश्वरी मंदिर का इतिहास, दंतेश्वरी मंदिर कहाँ है, मंदिर के दर्शन का समय (Danteshwari Temple Timings), यहाँ तक पहुँचने के तरीके (How to Reach) और मंदिर की वास्तुकला (Architecture of Danteshwari Mandir) के बारे में विस्तार से बताएँगे। साथ ही, दंतेश्वरी मंदिर के आसपास घूमने लायक प्रमुख स्थानों (Places to See Near Danteshwari Mandir) की जानकारी भी साझा करेंगे।

क्या है दंतेश्वरी मंदिर का इतिहास

दंतेश्वरी मंदिर लगभग 600 वर्ष पुराना माना जाता है और इसे भारतीय धरोहरों में एक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। बस्तर क्षेत्र में यह मंदिर धार्मिक आस्था के साथसाथ सामाजिक सौहार्द का भी प्रतीक माना जाता है। दंतेश्वरी मंदिर के निर्माण को लेकर कई लोकमान्यताएँ प्रचलित हैं, जिनमें से दो कथाएँ विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं।

पहली मान्यता के अनुसार, चालुक्य शासकों से पहले इस क्षेत्र पर नागवंशी राजाओं का शासन था, जिन्होंने देवी दंतेश्वरी का नाम बदलकर माणिकेश्वती रख दिया था। बाद में चालुक्य राजाओं ने 14वीं शताब्दी में इस मंदिर का निर्माण करवाया और देवी की पूजा पुनः दंतेश्वरी नाम से प्रारंभ हुई।

दूसरी लोककथा काकतीय वंश के राजा अनमदेव से जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि जब राजा अनमदेव इस क्षेत्र में आए, तो उन्हें माता दंतेश्वरी का आशीर्वाद मिला। माता ने वरदान दिया कि जहाँ तक वे आगे बढ़ेंगे, वहाँ तक उनका राज्य फैल जाएगा, लेकिन शर्त यह थी कि उन्हें पीछे मुड़कर नहीं देखना होगा। राजा आगे बढ़ते गए और माता उनके पीछेपीछे चलती रहीं। जब वे शंखनी और डंकनी नदियों के संगम पर पहुँचे, तो माता की पायल की आवाज़ सुनाई देना बंद हो गई, क्योंकि माता जल में चल रही थीं। राजा को लगा कि माता रुक गई हैं, और उन्होंने पीछे मुड़कर देख लिया। उसी क्षण माता वहीं विराम कर गईं और राजा का राज्य दंतेवाड़ा तक ही सीमित रह गया। बाद में राजा अनमदेव ने शंखनी और डंकनी नदियों के संगम पर माता दंतेश्वरी का भव्य मंदिर बनवाया।

दंतश्वरी मंदिर का नाम दंतेश्वरी क्यों पड़ा?

दंतेश्वरी मंदिर के नाम को लेकर भी एक प्रचलित धार्मिक मान्यता है। कहा जाता है कि दंतेवाड़ा को आधिकारिक रूप से 51 शक्ति पीठों में शामिल नहीं किया गया है, फिर भी इसे कई श्रद्धालु 52वाँ शक्ति पीठ मानते हैं। मान्यता के अनुसार, इसी स्थान पर माता सती का दाँत गिरा था। इसी कारण इस क्षेत्र का नाम दंतेवाड़ा पड़ा और यहाँ विराजमान देवी को दंतेश्वरी देवी कहा जाने लगा।

इतिहास में दंतेश्वरी देवी को काकतीय शासकों की कुलदेवी भी माना गया है। स्थानीय परंपराओं के अनुसार, माँ दंतेश्वरी को दुर्गा देवी का ही एक स्वरूप माना जाता है, और श्रद्धालु उन्हें शक्ति, संरक्षण और आशीर्वाद की अधिष्ठात्री देवी के रूप में पूजते हैं।

दंतेश्वरी मंदिर कहाँ स्थित है? (Danteshwari mandir kahan hai)

छत्तीसगढ़ में कई धार्मिक और पर्यटन स्थल मौजूद हैं, लेकिन दंतेश्वरी मंदिर का अपना विशेष महत्व है। यह प्रसिद्ध मंदिर छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र की खूबसूरत वादियों में स्थित दंतेवाड़ा शहर में बना हुआ है और श्रद्धालुओं के साथसाथ पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का प्रमुख केंद्र है।

दंतेश्वरी मंदिर दो पवित्र नदियोंशंखनी और डंकनीके संगम पर स्थित है, जिससे इस स्थान की धार्मिक महत्ता और बढ़ जाती है। यह मंदिर छत्तीसगढ़ की औद्योगिक नगरी जगदलपुर से लगभग 80 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है और आसानी से पहुँचा जा सकता है। यहाँ का शांत वातावरण, प्राकृतिक सुंदरता और धार्मिक आस्था इस मंदिर को बस्तर क्षेत्र के सबसे महत्वपूर्ण तीर्थ स्थलों में शामिल करते हैं।

दंतेश्वरी मंदिर के दर्शन करने से क्या लाभ होता है?

परंपरागत रूप से माँ दंतेश्वरी को बस्तर की कुलदेवी माना जाता है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि यहाँ सच्चे मन से माँगी गई मनोकामना अवश्य पूरी होती है। मंदिर की एक विशेष परंपरा यह भी है कि गर्भगृह में प्रवेश करते समय बिना सिले वस्त्र पहनने का नियम माना जाता है। इसलिए पुरुष श्रद्धालु आमतौर पर धोती या लुंगी पहनकर ही देवी के दर्शन करते हैं।

हर वर्ष दशहरा के अवसर पर आसपास के गाँवों और जंगलों से बड़ी संख्या में आदिवासी समुदाय के लोग माँ दंतेश्वरी की पूजा के लिए यहाँ पहुँचते हैं। इस दौरान देवी की प्रतिमा को मंदिर से बाहर निकालकर पूरे नगर में परिक्रमा कराई जाती है। परंपरागत रीतिरिवाजों के साथ रात भर लोक नृत्य और पारंपरिक गीतों का आयोजन होता है। यही भव्य उत्सवबस्तर दशहराके नाम से प्रसिद्ध है, जो क्षेत्र की संस्कृति और आस्था का अनूठा उदाहरण माना जाता है।

दंतेश्वरी मंदिर कैसे पहुँचे (How to Reach Danteshwari Temple)

By Air : रायपुर और विशाखापट्नम दो करीबी एयरपोर्ट हैंजो कि दंतेवाड़ा के रोड से 400 km की दूरी पर स्थित हैंजगदलपुर एक मिनी एयरपोर्ट है जो कि दंतेवाड़ा से मात्र 80km दूरी पर ही स्थित है मगर यहाँ flights सिमित हैं। 

By train : दंतेवाड़ा देवी मंदिर के लिए विशाखापट्नम रेलवे स्टेशन से दिन में दो ट्रेनें मिलती हैं। 

By road : दंतेवाड़ा मंदिर का रोड़ का रास्ता छत्तीसगढ़ के सभी छोटे बड़े शहरों से जुड़ा हुआ हैऔर यह रोड़ अच्छे हैंयह रायपुर से 400 km की दूरी पर है जिसके लिए आपको आसानी से पब्लिक ट्रांसपोर्ट मिल जायेगा जिससे की 8 घंटों का सफर तय करना पड़ेगा जबकि खुद के वाहन से 6-7 घंटे ही लगेगें  

दंतेश्वरी मंदिर की बनावट (Architecture of danteshwari mandir)

दंतेवाड़ा के दंतेश्वरी मंदिर में माँ दंतेश्वरी की ग्रेनाइट पत्थर से बनी आकर्षक प्रतिमा स्थापित है, जिस पर सुंदर नक्काशी की गई है। देवी की प्रतिमा में दोनों ओर तीनतीन भुजाएँ दर्शाई गई हैं। दाएँ हाथों में शंख, खड्ग और त्रिशूल हैं, जबकि बाएँ हाथों में घंटी, ढाल तथा राक्षस के बाल पकड़े हुए दिखाए गए हैं। प्रतिमा के ऊपरी भाग में नरसिंह अवतार का स्वरूप उकेरा गया है और मूर्ति के ऊपर चाँदी का छत्र स्थापित है। देवी के दोनों ओर द्वारपाल भी विराजमान हैं, जो मंदिर की पारंपरिक शैली को दर्शाते हैं।

मंदिर परिसर में विभिन्न स्थानों पर भगवान गणेश, भगवान विष्णु और भगवान शिव की मूर्तियाँ भी स्थापित हैं। यह मंदिर साधारण लेकिन पारंपरिक स्थापत्य शैली में बना हुआ है, जिसमें 32 स्तंभ (कास्ट पिलर) और खपरैल की छत का उपयोग किया गया है। मंदिर को चार प्रमुख भागों में विभाजित किया गया हैगर्भगृह, महामंडप, मुख्य मंडप और सभा मंडप। इनमें से गर्भगृह और महामंडप पत्थर से निर्मित हैं।

मंदिर के मुख्य द्वार के सामने गरुड़ स्तंभ स्थित है, जो इसकी वास्तुकला का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। पूरा मंदिर चारों ओर से एक परकोटे (दीवार) से घिरा हुआ है, जो इसे पारंपरिक मंदिर परिसर का स्वरूप प्रदान करता है।

दंतेश्वरी मंदिर खुलने का समय (Danteshwari temple timings)

दंतेश्वरी मंदिर सुबह 5 बजे से शाम को 7 बजे तक खुला रहता है जबकि दर्शन का समय सुबह 5:30 से शाम 6:45 तक ही हैऔर त्योहार और विशेष दिनों में यह समय मे बदलाव भी आता रहता है। 

दंतेश्वरी माता की आरती का समय

माता की आरती दिन में 3 समय होती है 

सुबह की आरती – 5 बजे सुबह

दिन की आरती – 12 बजे दोपहर

और शाम की आरती – शाम 7 बजे

दंतेश्वरी मंदिर के आसपास की घूमने की जगाहें (Plcaes to see near danteshwari mandir)

माँ दंतेश्वरी मंदिर के आसपास भी कई दर्शनीय स्थल मौजूद हैं, जहाँ श्रद्धालु और पर्यटक घूमने जा सकते हैं। मंदिर के पास स्थित एंथ्रोपोलॉजी म्यूज़ियम क्षेत्र की आदिवासी संस्कृति और परंपराओं को करीब से जानने का अच्छा स्थान है। इसके अलावा मोती तालाब पारा, कांगर वैली नेशनल पार्क और बस्तर महल भी प्रमुख आकर्षणों में शामिल हैं, जहाँ प्राकृतिक सुंदरता और ऐतिहासिक विरासत देखने को मिलती है।

दंतेश्वरी माता मंदिर के पास ही उनकी छोटी बहन भूवनेश्वरी देवी का मंदिर भी स्थित है, जिन्हें मावली माता मडिकेश्वरी के नाम से भी जाना जाता है। स्थानीय परंपरा के अनुसार, दोनों बहनों की आरती एक ही समय पर की जाती है, जो यहाँ की धार्मिक मान्यताओं का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है।

Shri Danteshwari Temple का पता

दंतेवाड़ाछत्तीसगढ़

इंडिया

पिनकोड: 494449

Last word:

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